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“श्री कृष्ण” एक उत्कृष्ट सलाहकार

By Nivesh Gyan   23 August

Category: Uncategorized

"श्री कृष्ण"  एक उत्कृष्ट सलाहकार

 

आप सभी निवेशकों को जन्मआष्ट्मी पर्व  की बहुत सी शुभकामना हम सभी जानते है की हमारे जीवन के हर महत्वपूर्ण  मोड़ पे एक सही सलाहकार की बहुत आवश्यकता होती है चाहे वो शिक्षा हो  स्वास्थ्य हो या वित्तीय सलाह हो. 

 

सबसे पहले हमे यह जानना चाहिए की हमे जीवन में एक सलाहकार की आवश्यकता क्यों होती है ? हमे जीवन में सलाहकार की आवस्यकता इसलिए होती है ही एक सलाहकार हमे हमारे व्यक्तिगत भय, लालच, भावनाओ से हमे बचाता है यह उसी तरह है जैसे एक सर्जन सभी का ओपरेशन करता है परन्तु वह अपने स्वयं बच्चो का ओपरेशन किसी दूसरे डॉक्टर से कराना बेहतर समझता है। सलाहकार का महत्व और इसका एक उत्कृष्ट उदहारण हमे महाभारत की कथाओ में मिलता है आईये जानते है :

 

एक बार जब दुर्योधन महाराज युधिष्ठिर को द्युत क्रीड़ा के लिए आमंत्रण देता है जिसे युधिष्ठिर  महाराज स्वीकार करते है हालांकि यहाँ उन्हें भगवान् श्री कृष्ण की तरफ से सावधान भी किया जाता है परन्तु वो सलाह न मानते हुए खेल में सम्मिलित होने अपने समस्त भाइयों के साथ जाते है, परन्तु वहां पर दुर्योधन अपने सलाहकार शकुनि के साथ होते है जो उस खेल का माहिर खिलाड़ी होता है खेल प्रारम्भ होता है और महाराज युधिष्ठिर एक के बाद एक दांव हारते है जिसमे पहले अपना राज्य, समस्त धन सम्पति और यहाँ तक की अपने भाईयो समेत खुद को और अपनी पत्नी द्रोपदी तक को हार जाते है यहाँ पर यह बात जानने योग्य है की महाराज युधिष्ठिर महाभारत काल के  सबसे बुद्धिमान, कुशल राजनीतिज्ञ , और शास्त्रों के पारंगत थे यहाँ तक की उनके नाम का अर्थ था की वो व्यक्ति जो युद्ध में भी खुद को स्थिर रख सकता हो. ऐसे सयंमी होते हुए भी वो अपने भावनाओ पर नियंत्रण नहीं रख पाए और अपना सबकुछ खो बैठे चूँकि दुर्योधन पूरा खेल अपने सलाहकार शकुनि के निर्देशन में में खेल रहा था तो वो युधिष्ठिर महाराज की तुलना में कमजोर होते हुए भी खेल जीत गया। क्या होता अगर वहां पर युधिष्ठिर महाराज भी अपने सलाहकार भगवान् श्री कृष्ण के साथ होते ? 

 

इतना होने के बाद भी किसी प्रकार से उन्हें उनका सबकुछ वापस मिल जाता है और वो अपने राज्य लौट जाते है लेकिन एक वर्ष के उपरान्त दुर्योधन पुनः उन्हें द्युत क्रीड़ा के लिए आमंत्रण करता है और युधिष्ठिर फिर से वही गलती करते है की श्री कृष्ण को अपने साथ नहीं ले के जाते एक बार फिर वो खेल हार जाते है और इस बार फिर उनको अपना सबकुछ गवाना परता है और 13 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञात वास जाना परता है। 

इतना सबकुछ नहीं होता अगर वह निर्णय अपने उत्कृष्ट सलाहकार के निर्देशन में लेते 

उपरोक्त कहानी बताने का तात्पर्य यह है की हम सभी निवेश करते समय ऐसी ही भूल करते है जानकारियों का अभाव होते हुए भी हमे लगता है की हमे पूर्ण जानकारी है और हम स्वयं निर्णय लेते है और गलतियां कर बैठते है।  अगर हमे पूरी जानकारी है भी तो भी हमे किसी अच्छे सलाहकार से मदद लेनी चाहिए क्युकी सलाहकार हमे हमारे भावनाओ के प्रभाव से मुक्त होकर निर्णय देता है। जैसा की कहानी में है अगर युधिष्ठिर चाहते तो एक या दो दांव हारने के बाद खेल रोक सकते थे परन्तु वहां पर उनको यह बताने वाला कोई नहीं था और वो अपने भावनाओ को वश में नहीं रख पाए। 

पिछली गलतियों से सीख :

दो बार गलत निर्णय लेने के बाद और सबकुछ खोने के बाद पांडव संभल गए और वो सर्वश्रेष्ठ सलाहकार श्री कृष्ण के सभी निर्देशों का सावधानी से पालन करने लगे यहाँ तक की जब यह तय हो गया की अब महाभारत का युद्ध होगा और अर्जुन यह भी जानते थे की श्री कृष्ण युद्ध में  शस्त्र नहीं उठाएंगे उसके बावजूद भी जब उनको श्री कृष्ण की उत्कृष्ट सेना और श्री कृष्ण में से कोई एक चुनने को कहा गया तो उन्होंने श्री कृष्ण को चुना जिसके फलस्वरूप वो कौरवो की तुलना में पांडवो की छोटी सेना होते हुए भी पांडव समस्त युद्ध जीत गए। 

कहानी का सार :

इससे कोई फर्क नहीं परता की हमने विगत कितनी गलतियां की है परन्तु अगर हम अपनी पिछली गलतियों से सिख कर आगे सावधान हो जाए तो इसमें बुद्धिमानी है।  इसी प्रकार अगर हमने गलत निर्णय के कारण अपना पैसा खोया है तो हमे अब सतर्क होके किसी अच्छे सलाहकार की मदद लेनी चाहिए क्युकी “जब जागो तभी सवेरा “